Slide
जीवन में हजारों लड़ाइयां जीतने से अच्छा है कि तुम स्वयं पर विजय प्राप्त कर लो : गौतम बुद्ध
previous arrow
next arrow
others

बक्सर सदर अस्पताल की खुली पोल, जज के फोन के बाद भी नहीं मिला इलाज

नेशनल आवाज़ /बक्सर :-  राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है. लेकिन जिले के सदर अस्पताल की स्वास्थ्य व्यवस्था बिल्कुल बेपटरी है. मॉनिटरिंग के लिए कई स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी भी लगे हुए हैं.बावजूद लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल रही है.यहां स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल उस समय खुल गई. जब सड़क दुर्घटना में घायल व्यवहार न्यायालय की एक महिला कर्मचारी को करीब दो घंटे तक इलाज के लिए इंतजार करना पड़ा.सबसे बड़ी बात है की न्यायिक अधिकारी के फोन करने एवं सिविल सर्जन की ओर से तत्काल इलाज का आश्वासन दिए जाने के बावजूद हड्डी रोग के डॉक्टर अस्पताल नहीं पहुंच सके.

दर्द की असहनीय पीड़ा से परेशान महिला कर्मचारी को अस्पताल के ही एक डॉक्टर के निजी क्लिनिक में जाकर 9,894 रुपये खर्च कर पैर में प्लास्टर कराना पड़ा. इस गंभीर मामले को लेकर पॉक्सो कोर्ट के अनन्य विशेष न्यायाधीश-सह-अपर सत्र न्यायाधीश षष्ठम् अमित कुमार शर्मा ने सिविल सर्जन को कारण बताओ नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.न्यायालय की ओर से जारी नोटिस के अनुसार, 30 अक्टूबर 2026 को व्यवहार न्यायालय बक्सर की उच्च वर्गीय लिपिक आरती कुमारी ड्यूटी पर आने के दौरान सड़क दुर्घटना में घायल हो गई.असहनीय दर्द से परेशान आरती को न्यायालय के दो कर्मचारी सुनील कुमार और संतोष कुमार सुबह करीब 10:30 बजे सदर अस्पताल लेकर पहुंचे.

अस्पताल में सरकारी पर्ची कटवाने के बाद आपातकालीन वार्ड में डॉक्टर से जांच कराई गई. डॉक्टर की सलाह पर एक्स-रे भी कराया गया. इसके बाद हड्डी रोग विशेषज्ञ से दिखाने के लिए कमरा नंबर 13 भेजा गया वहां ताला लटका मिला. अस्पताल कर्मियों ने बताया कि डॉक्टर अभी नहीं आए हैं.इसके बाद दोनों कर्मचारी सिविल सर्जन, डिप्टी सर्जन और चिकित्सा पदाधिकारी के कार्यालय पहुंचे.वहां भी संबंधित अधिकारी मौजूद नहीं मिले. कर्मचारियों को बताया गया कि साहब अभी नहीं आए हैं.मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष न्यायाधीश अमित कुमार शर्मा ने खुद सिविल सर्जन से फोन पर संपर्क किया.

सिविल सर्जन ने तत्काल समुचित इलाज की व्यवस्था कराने का भरोसा दिया. इसके बाद न्यायालय कर्मी संतोष कुमार ने भी दोबारा फोन कर स्थिति की जानकारी दी. उन्हें भी व्यवस्था किए जाने का आश्वासन मिला. बावजूद दोपहर तक कोई हड्डी रोग विशेषज्ञ इलाज के लिए नहीं पहुंचे. करीब दो घंटे तक इंतजार के बाद घायल महिला की परेशानी बढ़ने के बाद सहकर्मी उन्हें महामाया क्लिनिक ले गए.यह निजी क्लिनिक सदर अस्पताल के डॉक्टर विकास पाण्डेय द्वारा संचालित बताया गया है. वहां आरती कुमारी के पैर में प्लास्टर किया गया, जिसके एवज में उन्हें 9,894 रुपये का भुगतान करना पड़ा.

न्यायाधीश ने टिप्पणी की है कि जब न्यायिक पदाधिकारी और न्यायालय कर्मियों के लगातार संपर्क करने तथा आश्वासन मिलने के बावजूद एक न्यायालय कर्मचारी के इलाज की व्यवस्था नहीं हो सकी, तो सदर अस्पताल में आम लोगों की जांच और इलाज किस स्तर पर होता होगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है.उन्होंने सिविल सर्जन से स्पष्टीकरण मांगा है कि आखिर किन परिस्थितियों में करीब दो घंटे तक हड्डी रोग विशेषज्ञ की व्यवस्था नहीं हो सकी और घायल महिला को निजी क्लिनिक का रुख करना पड़ा.नोटिस में यह भी पूछा गया है कि संतोषजनक जवाब नहीं मिलने की स्थिति में उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की जाए और पूरे मामले की रिपोर्ट बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग के सचिव को क्यों नहीं भेजी जाए.

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button