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बक्सर में मिली संत कवि दरियादास की 300 वर्ष पुरानी दुर्लभ पांडुलिपियां, ‘ज्ञान भारतम मिशन’ के तहत लगी बड़ी सफलता

12 जून 2026

नेशनल आवाज़ /बक्सर :- बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूमि बक्सर में भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक बड़ी सफलता हाथ लगी है. भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे ‘ज्ञान भारतम मिशन’ के तहत बक्सर जिले से संत कवि दरियादास (बिहार वाले) की संतमत और भक्ति परंपरा से जुड़ी लगभग 300 वर्ष पुरानी तीन अत्यंत दुर्लभ हस्तलिखित पांडुलिपियाँ प्राप्त हुई हैं.​यह अमूल्य धरोहर बक्सर के निवासी लक्ष्मीकांत मुकुल के पैतृक पारिवारिक संग्रह से मिली है, जिसे उनके दादा जी ने पीढ़ियों से सहेज कर रखा था.श्री मुकुल ने स्वयं इस खोज की जानकारी उप विकास आयुक्त बक्सर एवं जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी को दी है.

कैथी लिपि और देशी कागज पर हुआ है लेखन

​प्रारंभिक अध्ययन और भौतिक बनावट के आधार पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि ये पोथियाँ करीब तीन सदी पुरानी हैं.हाथ से तैयार किए गए मोटे देशी कागज पर प्राकृतिक स्याही से इन्हें लिखा गया है. इन पांडुलिपियों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनका लेखन ‘कैथी लिपि’ में किया गया है और इसकी भाषा ‘भोजपुरी मिश्रित अवधी’ है, जो उस दौर की लोक-सांस्कृतिक चेतना और क्षेत्रीय भाषाई बनावट का जीवंत उदाहरण पेश करती है.

​पांडुलिपियों में क्या है खास?

अपेक्षाकृत छोटे आकार की इन तीनों पोथियों में लगभग 50 से 70 पृष्ठ हैं.इन्हें अत्यंत सावधानी और साधना के उद्देश्य से लिखा गया था.​पहली पांडुलिपि यह ‘सतनाम स्तुति’ पर केंद्रित है, जिसमें निर्गुण भक्ति, नाम-स्मरण और संतमत की मूल साधना की वैचारिक अभिव्यक्ति है.​दूसरी पांडुलिपि यह दरियादास की मौलिक रचना ‘प्रेम मूला’ है, जिसमें प्रेम को आध्यात्मिक साधना का आधार मानकर आत्मबोध की व्याख्या की गई है.​तीसरी पांडुलिपि यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें तत्कालीन समय की भक्ति धारा और संतमत धारा के समन्वय का अनूठा प्रयास दिखाई देता है.

इतिहास और शोध के लिए मील का पत्थर

जिला प्रशासन के अनुसार, यदि इन पांडुलिपियों की प्राचीनता पूरी तरह प्रमाणित होती है, तो यह उत्तर भारत की संत परंपरा, लोकभाषा और पांडुलिपि संस्कृति के इतिहास को समझने के लिए एक क्रांतिकारी स्रोत साबित होंगी.संत कवि दरियादास ने बिहार और पूर्वांचल के लोकजीवन में सामाजिक समरसता, निर्गुण भक्ति और आध्यात्मिक समानता के विचारों को फैलाया था.

शोधकर्ताओं के लिए खुलेंगे नए द्वार

​विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यधारा के इतिहास में लोक-परंपरा के इस ज्ञान को वह स्थान नहीं मिल पाया जिसका यह हकदार था.संत दरियादास का एक बड़ा साहित्य आज भी बिखरा हुआ या निजी संग्रहों में दबा है. ऐसे में इन तीन दुर्लभ पोथियों का मिलना देश-दुनिया के इतिहासकारों, भाषा-वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए नई संभावनाओं के द्वार खोलेगा. जिला प्रशासन अब इसके आगे के संरक्षण और प्रामाणिक अध्ययन की तैयारी में जुट गया है.

 

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